ईश्वर का न्याय

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ईश्वर का न्याय:- एक जंगल में एक अजीब टेढ़ा मेढ़ा सा पेड़ था। अन्य सभी पेड़ देखने में बड़े सुंदर व सीधे थे। उनके विपरीत इस अजीब पेड़ की डालियां और तना सभी देखने में बेढंगे थे। सभी पेड़ उस पेड़ का मजाक बनाते और उसे कुबड़ा कह कर बुलाते थे।

ईश्वर का न्यायईश्वर का न्याय

वह पेड़ भी जब स्वयं को देखता तो बहुत दुखी होता। वह सोचता,” काश मैं भी अपने अन्य भाइयों व मित्रों जैसा सुंदर व सीधा होता। भगवान ने मुझे बनाते हुए मेरे साथ न्याय नहीं किया।”
एक दिन उस जंगल में एक लकड़हारा लकड़ी काटने आया। टेढ़े मेढ़े पेड़ को देखकर वह बोला,” यह पेड़ तो मेरे किसी काम का नहीं है। ऐसा करता हूं, मैं सीधे व लंबे पेड़ों को काटता हूं।” इतना कहकर उसने सभी सुंदर व सीधे पेड़ों को काटकर जमीन पर डाल गिराया। यह देख कर खूब बड़े पेड़ की आंखें खुल गई। वह सोचने लगा,” ईश्वर जो भी करता है, अच्छा करता है। यदि मैं भी इन अन्य पेड़ों की तरह सीधा व सुंदर होता तो लकड़हारा मुझे भी काट देता।”

फिर वह ईश्वर से क्षमा याचना करते हुए अपनी गलती का पश्चाताप करने लगा।
वास्तव में अपने में किसी कमी के लिए ईश्वर को दोष देने की अपेक्षा हमें अपने भीतर मौजूद अन्य गुणों को पहचानना चाहिए।

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