उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता:- एक बार की बात है। एक लकड़हारा वन में लकड़ी काटने जा रहा था।मार्ग में उसने एक बाज को बहेलिया के जाल में फंसे हुए देखा। बाज को इस तरह जाल में फंसे देखकर उसे बाज पर दया आ गई। उसने तुरंत बाज को जाल से मुक्त कर दिया। बाज लकड़हारे को धन्यवाद देकर उड़ गया। ऑल लकड़हारा लकड़ियां काटने में लग गया।

उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता

कुछ समय पश्चात लक्कड़ हारा एक टीले पर बैठा दोपहर का भोजन कर रहा था। अचानक बाद तेजी से उड़ता हुआ आया और उस पर झपटा। इस कारण लकड़हारे का संतुलन बिगड़ गया और वह ढलान से लुढ़क कर नीचे आ गिरा। फल स्वरूप उससे कुछ खरोच भी आई। उससे बात पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह क्रोधित होते हुए बाज से बोला,” यह तुमने क्या किया? मैंने तुम्हारे प्राण बचाए और तुमने मुझे कष्ट दिया।

क्यों?” बाज नम्रता से बोला,” श्रीमान, मैंने भी आप के प्राण बचाए हैं। यदि मैं आपको सचेत ना करता तो वहां आपके पीछे छिपा साहब आपको डस लेता।” लकड़हारे ने हैरानी से टीले के पास देखा। वहां एक विषैला काला सांप फन फैलाए बैठा था। लकड़हारे ने बाज को उसके प्राण बचाने के लिए धन्यवाद दिया।

बड़ों ने सच ही कहा है कि किसी पर किया गया उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता।