चालाक विदूषक

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चालाक विदूषक:- एक राज के दरबार में एक बुद्धिमान वह चालाक विदूषक था। इसके अतिरिक्त वह सवभावतः बहुत मजाकिया भी था। वह अपने मजा तथा चुटकुलों से सभी को हंसाता रहता था। उसकी बुद्धिमानी और हंसमुख स्वभाव के कारण राजा उसको बहुत मान देते थे तथा हर बार पर उससे सलाह लेते थे। जिस कारण कई मंत्री विदूषक से ईर्ष्या करने लगे थे।

चालाक विदूषकचालाक विदूषक

एक बार विदूषक ने अपनी सीमा को लांगतै हुए राजा के साथ एक व्यंग्यपूर्वक मजाक कर दिया। राजा को वह व्यंग्य सहन नहीं हुआ तथा वह विदूषक पर बुरी तरह क्रोधित हो गए। विदूषक से जलने वाले मंत्रियों ने इस अवसर का लाभ उठाकर राजा को विदूषक के विरुद्ध खूब भड़काया। गुस्से में राजा ने विदूषक को मृत्युदंड दे दिया।

जब विदूषक को मृत्युदंड देने के लिए ले जाया जा रहा था तब राजा ने नियमानुसार उससे पूछा” तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है? तुम किस प्रकार मरना चाहोगे।” यह सुनकर विदूषक बोला,” महाराज! आपकी आज्ञा से मैं बुढ़ापे की मौत मरना चाहता हूं।”
यह बुद्धिमानी पूर्ण इच्छा सुनकर राजा सहित सभी दरबारी हंसने लगे। यह जवाब सुनकर राजा ने विदूषक को क्षमा कर दिया। अपनी बुद्धिमानी से विदूषक को पुनः वही पद व सम्मान मिल गया।

तभी तो कहा गया है कि जहां शक्ति से बात ना बने, वहां बुद्धि से बात बन जाती है।

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