जितना संभले उतना ले

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जितना संभले उतना ले:- अमन एक शरारती बालक था। उसे मिठाई खाने की बहुत ही बुरी आदत थी। इस कारण अमन की मां उसे ज्यादा मिठाई नहीं खाने देती थी क्योंकि ज्यादा मिठाई खाने से दांत खराब हो जाते हैं। इसीलिए मां ने मिठाई को एक तंग मुंह वाले मर्तबान में रखा हुआ था। वह मर्तबान रसोई के अंदर रहता था। एक दिन मैं घर पर नहीं थी।

जितना संभले उतना ले

जितना संभले उतना ले

मिठाई का भूखा मन चुपके से रसोई में पहुंचा और मर्तबान में से चोरी से मिठाई निकालने लगा। उसने अपने हाथ को मर्तबान में डाला था अपनी मुट्ठी में ढेर सारी मिठाई भर ली, परंतु जब वह हाथ बाहर निकालने लगा तो उसका हाथ मर्तबान के मुंह में फंस गया। जबकि अमन का हाथ बाहर नहीं निकल रहा था तब भी वह मिठाई को हाथ से छोड़ना नहीं चाहता था। मिठाई निकालने के प्रयास में उसके हाथों में खरोच भी लग गई थी।

अमन के पापा दूर खड़े होकर यह सब देख रहे थे। लेमन के पास आए और उसे समझाते हुए बोले,” बेटे! ज्यादा पाने का लोभ मत करो। यदि तुम एक -एक करके मिठाई निकालोगे तो मर्तबान में से मिठाई निकाल सकोगे।” ऐसे ही किया तथा मिठाई मर्तबान में से निकाल ली मिठाई पाकर वह बहुत खुश हुआ।

पता है इस कहानी में हमें यह शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति को एक समय में उतना ही लेना चाहिए जितना वह संभाल सके।

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