बुरे का अंत बुरा

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बुरे का अंत बुरा:– गांव के बाहर एक बूढ़ा सन्यासी रहता था। गांव के लोग उस सन्यासी की बहुत इज्जत करते थे। सन्यासी की एक आदत थी। भोजन करने से पहले वे अपने आसपास किसी गरीब अथवा भूखे व्यक्ति को भोजन खिला कर ही स्वयं भोजन करता था इस आदत के कारण कभी-कभी तो उसे भूखा ही रहना पड़ता था।

बुरे का अंत बुराबुरे का अंत बुरा

एक दिन वह एक गांव में भिक्षा मांगने गया। जिस क्रम में वह भीख मांग रहा था, वह अगर एक दुष्ट बुढ़िया का था। वह किसी को कुछ भी नहीं देना पसंद करती थी। फिर भी गुस्से में उसने सन्यासी को कुछ भोजन दे दिया।
दूसरे दिन वह सन्यासी फिर उसी बुढ़िया के घर पहुंचा। बुढ़िया ने आज भी मन बनाकर सन्यासी को भिक्षा दे दी।

परंतु जब सन्यासी लगातार तीसरे दिन भी उसके घर पहुंचा तो बुढ़िया ने चीड़कर कुछ चावलों में जहर मिलाकर सन्यासी को दे दिए। घर आकर जैसे ही सन्यासी उन चावलों को खाने लगा, उससे अपने दरवाजे पर एक युवक दिखाई दिया जो बहुत भूखा था और सफर के कारण थका हुआ था। अपनी आदतानुसार सन्यासी ने उस युवक को अपना भोजन दे दिया। बदकिस्मती से वह युवक उसी बुढ़िया का पुत्र था जो किसी काम से शहर गया था। चावल खाते ही वह तुरंत मर गया। भूरिया की करने से उसके की पुत्र की मृत्यु हो गई।

अतः बुरे का अंत बुरा होता है।

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