महल के साथ झोपड़ी

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महल के साथ झोपड़ी:- भारत के इतिहास में अनेक राजा महाराजा हुए हैं जो अपने कार्य तथा लोकप्रियता के कारण आज भी जाने जाते हैं। राजा विक्रमादित्य उनमें से एक थे। राजा विक्रमादित्य अपने न्याय के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। प्रजा उनकी आज्ञा को भगवान का आदेश समझकर पालन करती थी।

महल के साथ झोपड़ीमहल के साथ झोपड़ी

एक बार उन्होंने अपने मंत्री को नदी के किनारे एक सुंदर स्थान पर महल बनाने का आदेश दिया। मंत्री ने तुरंत मजदूरों को काम पर लगा दिया। परंतु महल के आंगन के बीच में एक झोपड़ी आ रही थी, जिसमें एक बुढ़िया रहती थी। इस झोपड़ी के कारण राज महल की शोभा खराब हो रही थी।
मंत्री ने उस बुढ़िया को वहां से झोपड़ी हटाने का आदेश दिया। बुढ़िया ने वहां से झोपड़ी नहीं हटाई तथा न्याय के लिए राजा के पास पहुंची। विक्रमादित्य ने मंत्री से सारी समस्या सुनी। फिर उन्होंने बुढ़िया को कहीं अलग से झोपड़ी बनाकर देने तथा साथ में स्वर्ण मुद्रा देने का प्रस्ताव रखा।

परंतु बुढ़िया ने उनका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। वह बोली,” महाराज! मैं वर्षों से यहां रह रही हूं। यह मेरे पति की एकमात्र निशानी है। अपने मरने से पहले मैं इसे नहीं छोड़ना चाहती।”
गरीब बुढ़िया की भावनाओं की कद्र रखते हुए राजा ने मंत्री को आदेश दिया कि झोपड़ी की जगह छोड़कर महल बनवाया जाए।

अतः सभी ने न्यायप्रिय राजा के न्याय की प्रशंसा की।

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