महाशिवरात्रि का पर्व

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हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का अनूठा महत्व है। महाशिवरात्रि का पर्व हर वर्ष फाल्गुन माह फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव का बहुत शुभ योग बनता है तथा इस दिन नक्षत्र धनिष्ठा में रहते हैं। चंद्रमा मकर राशि में विराजमान रहता है। माना जाता है, कि इस दिन स्वयंभू शिव की पूजा होती है।

आइए हम जानते हैं, महाशिवरात्रि का महत्व एवं पूजा का विशिष्ट तरीका महाशिवरात्रि के व्रत का विशिष्ट महत्व तथा फल प्राप्त होता है। इस दिन सभी महिलाएं भगवान शिव तथा पार्वती के नाम का व्रत रखती हैं तथा भगवान शिव की पूजा करने के लिए सुबह नहा धोकर दूध जल फल तथा विभिन्न प्रकार की पूजा की सामग्री लेकर मंदिर में जाती है। भगवान शिव पर कच्चे दूध व जल से अभिषेक करती हैं।

इस दिन कुंवारी कन्याएं भगवान शिव के नाम का व्रत रखती हैं और अच्छे अच्छे वर की प्राप्ति प्रार्थना करती है। ऐसा माना जाता है, कि भगवान शिव की आराधना करने से अच्छे पति की प्राप्ति होती है। इसलिए सभी कुंवारी महिलाएं अच्छे वर की प्राप्ति की आकांक्षा से भगवान शिव की पूजा आराधना करती हैं, व्रत कर उन्हें प्रसन्न करती हैं।

महाशिवरात्रि का पर्व इस वर्ष 1 मार्च 2022 मंगलवार के दिन मनाया जाएगा। निश्चिता काल में महाशिवरात्रि का पर्व 1 मार्च सुबह 12 बजकर 8 मिनट से लेकर 12 बजकर 58 मिनट तक। जिसकी अवधि लगभग 50 मिनट तक रहेगी।

महाशिवरात्रि पर्व की शुभ अवधि

प्रथम पहर में 1 मार्च की शाम 6: 21 मिनट से लेकर 9:27 मिनट तक रहेगी।
द्वितीय पहर में 2 मार्च की रात 9:27 मिनट से 12:33 मिनट तक रहेगी।
तृतीय पहर में 2 मार्च को 12:33 मिनट से 3:39 मिनट तक रहेगी।

शिवलिंग का विशेष महत्व है, महाशिवरात्रि के पर्व पर। भगवान शिव की पूजा के लिए शिवलिंग को प्रतीक माना जाता है। शिव का अर्थ होता है, कल्याणकारी और लिंग का अर्थ होता है, सृजन करने वाला माना जाता है।ब्रह्मांड का प्रतीक भी माना जाता है।

महाशिवरात्रि पर शिवजी को अर्पण किए जाने वाले मुख्य मुख्य वस्तु में इस प्रकार है-
शिवरात्रि के दिन सभी लोग स्त्री एवं पुरुष प्रातः काल स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं।
तथा घर से पूजा की थाली तैयार करके मंदिर की ओर जाते हैं। पूजा की थाली में बेलपत्र, आक, धतूरा, फूल, चावल, कुमकुम, रोली मोली, अगरबत्ती इत्यादि का मुख्य महत्व रहता है। भगवान शिव जंगलों में रहा करते थे, इसलिए उन्हें फल फूल कंदमूल आदि चढ़ाए जाते हैं। यह उनके प्रिय माने जाते हैं।

इस दिन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए जो भक्त शिव पुराण महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण भी करते हैं। रात्रि में शिव जी के भजन व आरती तथा मंदिरों में जागरण कार्यक्रम प्रमुखतः होता है।


भगवान शिव तथा माता पार्वती का विवाह भी इसी दिन माना जाता है, इसलिए कहीं कहीं पर शिव पार्वती के विवाह का आयोजन भी किया जाता है। विशाल मेलों का आयोजन होता है। भारतीय परंपरा त्योहारों उत्सव मेला से भरपूर है। भारत में महाशिवरात्रि के पर्व पर हर जगह शिवजी के मेलों का आयोजन होता है। प्रयाग, उज्जैन, काशी और शिव जी की स्थली पर विशेष आयोजन होते हैं।

दान करने का भी विशेष महत्व है, महाशिवरात्रि पर।

महाशिवरात्रि पर माता पार्वती तथा शिवजी भगवान के विवाह का होना माना जाता है पुराणों में। आईये, इस कथा को पूर्ण विस्तार से जानते हैं-

माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करने की इच्छुक थी सभी देवताओं ने पर्वतराज कन्या पार्वती माता का विवाह शिवजी से करवाने का संकल्प लिया देवताओं ने कंदर्प को पार्वती की मदद के लिए भेजा लेकिन शिवजी ने उन्हें अपनी तीसरी आंख से भस्म कर नष्ट कर दिया तब पार्वती माता ने ठान लिया कि वह विवाह करेंगी तो सिर्फ भगवान शिव से ही करेंगी उन्होंने उन्होंने भगवान शिव को मन ही मन वर चुन लिया था।

शिवजी अपनी कठोर तपस्या में मग्नती माता पार्वती ने भी शिव जी को पाने के लिए खूब तपस्या की उनकी तपस्या के चलते चारों ओर हाहाकार तबाही मच गई पर्वतों की नीव डगमगाने लगी भगवान शिव ने अपनी आंख खुली और पार्वती का आवह्रन किया और भगवान शिव ने उन्हें एक समृद्ध राज राजकुमार से शादी करने के लिए कहा परंतु माता पार्वती ने इंकार कर दिया। माता पार्वती अपने फैसले पर अडिग रही।

उन्होंने कहा यदि मैं विवाह करूंगी, तो आप से ही करूंगी। माता पार्वती की जिद के आगे भगवान शिव मजबूर हो गए, पार्वती माता हठी थी। तब सभी देवताओं ने भगवान शिव से माता पार्वती की इच्छा को मान लेने के लिए कहा।

एक अन्य मान्यता यह भी है, कि अपने परिवार के साथ जाकर वधू का हाथ मांगना पड़ता है। अब ऐसी स्थिति में भगवान शिव ने अपने साथियों डाकिनी भूत प्रेत चुड़ैलों को साथ ले जाने का निर्णय किया। तपस्वी होने के चलते शिवजी इस बात से अवगत नहीं थे, कि वह के लिए किस प्रकार से तैयार हुआ जाता है, तो उनके डाकिनी और चुड़ैलों ने उनको भस्म से सजा दिया हड्डियों की माला भी पहना दी।

जब भगवान शिव इस दिव्य रूप में माता पार्वती को लेने गए, तो पार्वती माता ने उन्हें तुरंत स्वीकार कर लिया और ब्रह्मा जी की उपस्थिति में विवाह समारोह संपन्न हुआ। माता पार्वती और भोलेनाथ ने एक दूसरे को वरमाला पहनाई या उसी वक्त संपन्न हुआ। तभी से महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। भगवान शिव इस पूरी पृथ्वी के पालनहार माने जाते हैं। संहार माने जाते हैं जो भी व्यक्ति भगवान शिव की पूजा दिल से करता है। उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है ऐसी मान्यता भारतीय संस्कृति में है।

इस दिन माता पार्वती को सुहाग का सामान अर्पित करते हुए पार्वती और शिव को लाल कलावे से 7 बार बांध देना चाहिए इसके बाद शीघ्र विवाह की प्रार्थना करनी चाहिए इससे कुंवारी कन्याओं के शीघ्र विवाह के योग बनते हैं। सुहागिन स्त्रियों को इस पूजा से अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है।

इस वर्ष 2022 में महाशिवरात्रि कब है?

इस वर्ष 2021-22 में 1 मार्च 2022 को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा।

शिवरात्रि का पर्व इस वर्ष किस तिथि को पड़ेगा?

इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व त्रयोदशी कृष्ण पक्ष पर पड़ेगा।

महाशिवरात्रि पर किसकी पूजा की जाती है?

महाशिवरात्रि पर माता पार्वती तथा भगवान शिव की पूजा की जाती है।

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