साधु और उसका दिखावा

साधु और उसका दिखावा:- एक बार एक साधु नदी पार करने के लिए नदी के किनारे पहुंचा। वह नाव में बैठने ही वाला था कि दूसरे किनारे पर उसने एक साधु को तपस्या करते हुए देखा। दूसरे साधू पर अपना रौब जमाने के लिए वह नाव से नदी पार न करके अपने तक केबल से पानी के ऊपर चलते हुए नदी के दूसरे किनारे पर पहुंचा।

साधु और उसका दिखावा

साधु और उसका दिखावा

दूसरे किनारे पर पहुंचकर वह तपस्या करने वाले साधु के पास पहुंचा और बोला,” देखा मेरा कमाल? मैंने किस प्रकार पानी के ऊपर चलते हुए नदी पार की है।”
” हां मैंने देखा, आपने यह कहां से सीखा?” दूसरे साधु ने नम्रता से कहा।” इसके लिए मैंने बहुत मेहनत की है। मैंने लंबे समय तक तपस्या करके भगवान से यह है शक्ति प्राप्त की है।” पहले साधु ने कहा।”

फिर आपने अपनी इस शक्ति को व्यर्थ ही नदी पार करने में खर्च किया क्योंकि इस नदी को तो आप केवल पचास पैसे देकर भी पार कर सकते थे।” दूसरे साधु ने बड़े ही शांत भाव से कहा। यह सुनकर पहले साधु को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ। वह दूसरे साधु से क्षमा मांग कर अपनी राह चल दिया।

इसलिए हमें कभी भी व्यर्थ का दिखावा नहीं करना चाहिए क्योंकि कभी-कभी व्यर्थ का दिखावा भी अपमान का कारण बन जाता है।