Holi kyu Manai Jati hai| होली क्यों मनाई जाती है। जानिए हिंदी में

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Holi kyu Banai Jati hai

Holi kyu Manai Jati hai

Holi kyu Manai Jati hai| होली क्यों मनाई जाती है। 

Holi kyu Manai Jati hai- रंगों का त्योहार होली भाईचारे और आपसी प्रेम को बढ़ाने वाला त्योहार है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर अपना प्रेम प्रदर्शित करते हैं और मिठाई तथा पकवान से मुंह मिठा कराते हैं, ताकि मन में जो कड़वाहट हो, वो इस होली के त्योहार पर निकल जाए।

होली के त्योहार में होलिका दहन और रंगवाली होली यानी धुलण्डी का विशेष महत्व है। होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष होलिका दहन 17 मार्च और रंगवाली होली यानी धुलण्डी 18 मार्च को मनाई जाएगी।

होलिका दहन मुहूर्त

तारीखदिनमहीनासमय
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ-समाप्त17गुरुवारमार्च3:03 AM-11:17PM
भद्रा पूँछ17गुरुवार मार्च 21:20 से 22:31
भद्रा मुख17गुरुवार मार्च 22:31 से 00:28
होलिका दहन17गुरुवार मार्च
09:20  से 10:31  PM
होली18शुक्रवार मार्च

होलिका दहन के साथ होलाष्टक समाप्त

होलिका दहन करने के साथ ही 08 दिनों का होलाष्टक समाप्त हो जाएगा। होली से पूर्व के 8 दिनों को होलाष्टक कहा जाता है।, जो होलिका दहन तक रहेगा। होलाष्टक के 8 दिनों की गणना के लिए हिन्दू कैलेंडर की तिथियों का प्रयोग किया जाता है, न कि अंग्रेजी कैलेंडर के दिनों का।

रंगवाली होली या धुलण्डी: 17 मार्च दिन रविवार की रात होलिका दहन करने के बाद उसके अगले दिन 18 मार्च सोमवार  को रंगवाली होली या धुलण्डी खेली जाएगी। रंगवाली होली के दिन लोग एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाएं, साथ ही शुभकामनाएं देंगे।

होली के त्यौहार की कथा

होली के त्यौहार की बहुत ही पुरानी कहानी हैं यह कहानी होलिका दहन के विषय में हैं की हम हलिका दहन क्यों करते हैं।

यह कहानी प्राचीन समय की हैं हिरण्यकश्यप नामक एक बहुत ही दुष्ट राजा हुआ करता था। वह अपनी पूरी प्रजा पर बहुत ही अत्याचार करता था और प्रज को मजबूर करता था की प्रजा उसे अपना राजा ही नहीं बल्कि अपना इष्ट देवता भी माने। उसे भगवान विष्णु से काफी चिढ़ थी, क्यूंकि भगवान विष्णु ने उसके छोटे भाई की हत्या की थी वह भी हिरण्यकश्यप कांति ही दुष्ट था जिसके लिए भगवान् ने उसका वध किया। उसने अपने आप को काफी शक्तिशाली बनाने के लिए बहुत तप और प्रार्थना की। 

लेकिन उसकी तपस्या सफल रही और आख़िरकार उसे ऐसा वरदान मिला जिससे सभी को लगा की ये अमर हैं और इसे संसार की कोई ताकत हरा नहीं सकती। इसके बाद से ही लोग ओर ज्यादा उससे डरने लग गए। वह सभी लोगो से अपनी पूजा ओर भक्ति करवाता था। राजा का एक पुत्र था प्रहलाद जो दिन भर विष्णु भगवान् की पूजा किया करता था उनका अन्नय भक्त था। 

लेकिन राजा को यह बात मान्य नहीं थी की उनके होते हुए उनका पुत्र उनके दुश्मन की पूजा करे। उन्होंने पुत्र प्रहलाद को डरा धमकाकर बहुत समझने की कोशिश की पर प्रहलाद पर किसी भी बात का कोई असर नहीं हुआ। थक हारकर राजा ने उसे मरने का सोचा क्यूंकि यदि पुत्र ही पिता की भक्ति नहीं करेगा तो प्रजा कैसे करेगी हिरण्यकश्यप के दिमाग में यह विचार आया। हिरण्यकश्यप ने बहुत तरह से प्रहलाद को मरने की कोशिश की पर हर बार उसे भगवान विष्णु जी बचा लेते थे।

एक दिन उन्होंने अपनी बहन होलिका को बुलाया होलिका को आग में बहुत देर तक बैठे रहने का वरदान प्राप्त था और वह आग में जल नहीं सकती थी। हिरण्यकश्यप का अपनी बहन द्वारा प्रहलाद को आग से जलाने का विचार था। जब होलिका ले प्रहलाद को अपनी गोद में बैठाया तब प्रहलाद पूरा समय भगवान् विष्णु के नाम का जाप किये जा रहा था।

होलिका दहन

इस अग्नि में प्रहलाद तो बच गया परन्तु होलिका उसी अग्नि में जलकर राख हो गई अर्थात बुराई को हराकर अच्छाई की जीत हुई। यह सब देहकर भी हिरण्यकश्यप ने हर नहीं मानी और स्वयं ही प्रहलाद को मारने लग तब भगवान् विष्णु जी ने नरसिम्हा का रूप धारण कर के हिरण्यकश्यप का वध किया।
इसलिए होली के एक दिन पहले होलिका दहन अर्थात बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता हैं।

होली के त्यौहार का महत्व

होली का त्यौहार बहुत ही हर्षोलास के साथ मनाया जाता हैं। यह भी कहा जाता हैं की भगवान कृष्ण जो की विष्णु जी के ही अवतार थे उन्हें रंगो से बहुत मोह था या यूँ कह लो की उन्हें राण बहुत पसंद थे। इसलिए होली का त्यौहार रंगो से लोकप्रिय हुआ।

भगवान् श्री कृष्ण यह त्यौहार अपने साथियो के साथ वृन्दावन और गोकुल में बड़े ही धूम-धाम के साथ मानते थे। श्री कृष्ण बरसाने में भी राधा जी क साथ होली पर रस रचाते थे और लठमार होली भी खेलते थे। इस त्यौहार को सबसे ज्यादा मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, बरसाने, और द्वारकेंगे में भी बहुत हर्षोलास के साथ मनाई जाती है।

होली के त्यौहार का एक ओर मकसद हैं ” इस दिन को होली वसंत मोहत्सव या काम मोहत्सव ” भी कहते है और इसके आने पर सर्दी के दिन ख़त्म हो जाते हैं। किसान फसल के अच्छा होने की ख़ुशी में होली मानते हैं।

लट्ठमार होली

होली का उत्सव तो मथुरा, वृंदावन और बरसाने में ही देखने को मिलती है। बरसाने की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली का आनंद ही अलग है। इसे देखने के लिए देश-दुनिया से लोग आते हैं। लट्ठमार होली में नंदगांव के ग्वाल-बाल गोपियों के साथ होली खेलते हैं और राधारानी के मंदिर में ध्वजारोहण करते हैं।

लट्ठमार होली

गोपियां बरसाने में अबीर-गुलाल और लाठियों से ग्वाल-बाल का स्वागत करती हैं, वहीं ग्वाल-बाल अपनी सुरक्षा के लिए मजबूत ढाल लेकर आते हैं।

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