Karva Chauth 2022, Karva Chauth Vrat Katha

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आइए जानते हैं 2022 में करवा चौथ की तिथि कब है

इस वर्ष करवा चौथ 13 अक्टूबर 2022 को आएगी। जैसा कि हम सभी जानते हैं, करवा चौथ का त्यौहार हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आता है। इस वर्ष भी यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी 24 अक्टूबर 2021 को आएगा। यह त्योहार मुख्यता विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत उपवास रखती हैं। साथ में कुछ स्थानों पर अविवाहित कन्याओं द्वारा भी इस व्रत को अच्छे वर की प्राप्ति के लिए किया जाता है। यह त्यौहार पूरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

karva chauth date 2022

हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष चतुर्थी के दिन करवा चौथ मनाया जाता है। इस के उपवास के पूजा मुहूर्त- 6:55 से 8:51 तक रहेगा।

करवा चौथ 2022 शुभ मुहूर्त

पूजा मुहूर्त- 5:46 से 6:50 तक

 

आइए जानते हैं, करवा चौथ पर्व का महत्व

भारतीय संस्कृति में व्रतों पर वो पर वो त्योहारों का विशेष स्थान है। जिनका अपना अपना महत्व होता है। उन सब त्योहारों में एक करवा चौथ का पर्व है। यह त्योहार विशेषकर विवाहित महिलाओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण होता है। इस दिन विवाहित महिलाएं जिन्हें सुहागन भी कहा जाता है। वह अपनी अपने पति की दीर्घायु स्वास्थ्य के लिए व्रत रखती हैं। कहीं-कहीं तो कुंवारी महिलाएं भी व्रत रखती है, नए जीवन में अच्छे जीवन साथी के लिए। करवा चौथ का यह व्रत निर्जला भी रखा जाता है। इस व्रत में ना तो कुछ खाया जाता है और ना ही कुछ पिया जाता है शाम को करवा माता का पूजन किया जाता है।

विवाहित महिलाएं इस दिन लाल रंग के वस्त्र पहन कर सुसज्जित होकर रहती हैं, पूजा की थाली सजाती हैं। करवा चौथ के व्रत की पावन कथा सुनती है। इसके बाद महिलाएं माता पार्वती का पूजन करके अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। अपने करवे को लेकर 7 बार घूमती हैं। इसी के साथ चौथ माता को हलवा, पूरी, मीठी मट्ठी,मिठाई, गुड आदि का भोग लगाती है। इन सब क्रियाओं के बाद शाम को चंद्र देवता को अर्घ्य दिया जाता है, और पति के हाथ से पानी पीकर करवा चौथ का पावन व्रत खोला जाता है। वही करवा चौथ के दिन अविवाहित महिलाएं तारों को अर्घ्य देकर अपना व्रत पूरा करती हैं।

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करवा चौथ करने के कुछ नियम इस प्रकार हैं

  1. करवा चौथ का यह व्रत सूर्य उदय से पूर्व प्रारंभ होकर चंद्र उदय तक रखना होता है।
  2. चंद्र दर्शन तथा अर्घ्य देने के बाद ही व्रत पूरा होता है।
  3. संध्या के समय चंद्र उदय से पूर्व भगवान शिव के संपूर्ण परिवार माता पार्वती, गणेश जी भगवान, कार्तिकेय जी तथा शिव जीवन की सवारी नंदी की पूजा अर्चना तथा ध्यान किया जाता है।
  4. पूजा करते समय देव प्रतिमा का मुंह हमेशा पश्चिम दिशा की तरफ होना चाहिए तथा पूजा करने वाली स्त्री का मुंह हमेशा पूरब दिशा की ओर होना चाहिए।

करवा चौथ व्रत प्रारंभ करने का सामान्य तरीका

करवा चौथ प्रारंभ करने का सामान्य तरीका सुबह 3:00 बजे सूर्योदय से पहले सरगी लेकर प्रारंभ होता है। जो महिलाएं व्रत रखती हैं, उनके लिए सरगी उनकी सास या घर में बड़ी कोई भी औरत बनाती है। शाम के समय आसपास की सभी महिलाएं श्रंगार करके एक जगह इकट्ठा होकर फेरी की रसम करती हैं। इस रस में महिलाएं गोल घेरा बनाकर बैठती हैं और उनके द्वारा सजाई गई पूजा की थाली को एक दूसरे को देख कर पूरे घेरे में घूम आती हैं। इस रस्म के दौरान एक बुजुर्ग महिला जिसे कथा का अच्छा ज्ञान होता है। वह कथा का वाचन करती है। यह पर्व चौथ माता गणेश जी भगवान तथा माता पार्वती की उपासना से जुड़ा है।

चौथ माता के व्रत की पूजा सामग्री

पूजा के लिए माता की श्रंगार के लिए चूड़ी, बिंदी, कंगन, काजल, मेहंदी, लाल कपड़ा, गंगाजल, मिट्टी के करवे, ताजे फूल, चावल, कुमकुम, सुपारी, हल्दी, रोली, सिंदूर, दीपक, अगरबत्ती, धूप बत्ती, भोग के लिए पूरी, हलवा, गुड, मोली मिठाई, छलनी इत्यादि की आवश्यकता होती है।

आइए जानते हैं करवा चौथ की पूजा का तरीका

  • चौथ माता की पूजा शाम के समय की जाती है। इस दिन सभी विवाहित स्त्रियां या व्रत को रखने वाली स्त्रियां स्नानादि से निवृत्त होकर लाल रंग की साड़ी लहंगा चोली या सूट (जो भी उनका परिधान हो) वह धारण करती है, पूरा श्रृंगार करती हैं।
  • अब वह महिला एक साफ चौकी पर या बाजोटिये पर गंगाजल छिड़क कर उस पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर चौथ माता की तस्वीर स्थापित करती है।
  • इन सबके बाद मिट्टी के दो करवे तथा पीतल का एक लोटा जिन्हें जल से भरकर माता के सामने रखते हैं, इसके बाद उसमें अक्षत डालते हैं।
  • उन दोनों करवों पर तथा पीतल के लोटे पर फूल या सिक्का डालें।
  • अगर आप यह व्रत पहली बार कर रही हैं तो करवे को शक्कर से भरे।
  • मिट्टी के करवों पर सुपारी, मिठाई, रबड़ी, सिंघाड़ा आदि रखें।
  • इसके बाद फूल माला चढ़ाएं चौथ माता को हल्दी, कुमकुम, रोली आदि का तिलक करें।
  • इन सब का तिलक शिव भगवान के पूरे परिवार पर करें तथा चौथ माता के पाठें के ऊपर 5-5 पीके लगाएं।
  • माता के पाठ के दोनों तरफ साठियां बनाएं।
  • धूप बत्ती, अगरबत्ती और दीपक जलाएं। माता चौथ की आरती गाएं।
  • इन सब क्रियाओं के बाद माता को सिंदूर, चूड़ी, पूरा श्रृंगार का सामान अर्पित करें।
  • चौथ माता का गणेश जी की आरती कर दोनों करवों की अदला-बदली करें।
  • अगर कोई कथा सुनाने वाला है, तो उसे कथा सुनें अन्यथा स्वयं ही कथा का वाचन करें तथा कलश में जल भरकर उस पर धीरे से मारते हुए हुंकारी भरवाए।
  • अब चंद्रमा के निकलने का इंतजार करें।
  • चंद्र उदय होने पर अपने पति के साथ छत पर जाएं तथा चंद्र देवता को जल का अर्पण करें उनकी पूजा करें तथा अपने पति की भी पूजा करें, उन्हें तिलक आदि करें तथा पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेवे तथा उनके हाथ से जल पीकर व्रत पूरा करें।
  • अपने पति का मुख छलनी से 7 बार देखें तथा 7 बार ही चंद्रमा को देखें छलनी से और मन ही मन यह प्रार्थना करें, कि मेरा पति आप ही की तरह दीर्घायु स्वस्थ तेजस्वी होवें।
  • अगली सुबह अपनी सास या ननंद या घर की बड़ी- बुजुर्ग महिला को वस्त्र, श्रृंगार आदि सामग्री देकर चरण छू कर सदा सुहागन का आशीर्वाद प्राप्त करें।

Karva Chauth Vrat Katha

चौथ माता पर प्रमुख कथाएं जिन का वाचन किया जाता है, इस प्रकार हैं-

एक बार पार्वती जी ने श्री गणेश जी से पूछा कि हे पुत्र कार्तिक की चौथ का क्या विधि विधान है, सो कहो? गणेश जी ने कहा हे माता कार्तिक की कृष्ण पक्ष की चौथ को करवा चौथ भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन पूजा में एक मिट्टी का करवा उसमें जल भर के रखा जाता है। कहीं-कहीं पर इसमें गेहूं भी भरकर रखते हैं लोग पर। राजस्थान में तो जल ही भर कर रखा जाता है। जिन लड़कियों की अभी तक शादी नहीं हुई है, वह अपने पिहर में शक्कर की करवे रखकर पूजा करती हैं तथा जिनकी शादी हो चुकी है वह ससुराल में यह व्रत करवे में पानी भर कर करती हैं।

किसी गांव में एक साहूकार रहता था। जिसके साथ लड़के तथा एक लड़की थी। सेठानी और सातों बहुएं चौथ माता की व्रत करती थी। एक बार लड़की ने भी व्रत किया था। प्राय: भोजन करते समय वह अपने भाइयों के साथ ही भोजन किया करती थी। उस दिन भी भाई रोज की भांति भोजन करने बैठे हैं, तो बहन को भी साथ में भोजन के लिए कहा बहन बोली भैया मैं नहीं खाऊंगी अभी तो चांद नहीं उगा है। मैं तो चांद को देखकर भोजाइयों के साथ ही भोजन करूंगी। इस पर एक भाई के पास एक नीम के पेड़ पर चढ़कर जलती हुई लकड़ी दिखाकर उसे चलनी आडी देकर दिखाया, तो दूसरे भाई ने कहा देख बहन तेरा चांद आ गया है। लड़की भोली थी, उसे भूख भी लग रही थी। उसने आव देखा ना ताव बिना मां और भोजाईयों से पूछे बिना भोजन कर लिया। इस तरह व्रत भंग के दोष से चौथ माता उस पर कुपित हो गई। उसी समय उसके ससुराल से आदमी आया कि उसका पति बीमार है, उसे ससुराल जाना पड़ा। वहां उसकी बीमारी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी‌। दवा दारू में घर का सारा धन खत्म हो गया था। घर के सभी स्त्री-पुरुष दुखी हो गए थे। एक दिन उस लड़की को उस करवा चौथ की गलती याद आई, तो उसने बहुत पश्चाताप करते हुए चौथ माता से क्षमा मांगी। फिर उससे व्रत करना शुरू किया और अब तो बहुत ही लगन से व्रत करने लगी, तो गणेश जी और चौथ माता की कृपा उसके पति पर हुई। उसका पति बिल्कुल ठीक हो गया। उसके अगाडा या ठाठ हो गया। इस तरह जो भी व्यक्ति सच्चे भाव से इस व्रत को करते हैं। उनको मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।

चौथ माता का इतिहास एवं चमत्कार

शिवभक्त राजा बीजल के पराक्रमी पुत्र महाधिराज श्री श्री भीमसिंह जी महाराज द्वारा आज से करीब बहुत वर्ष पूर्व बरवाड़ा के दक्षिण की तरफ पचला नामक स्थान से श्री चौथ माता जी की प्रतिमा लाकर कस्बे के पास स्थित अरावली श्रंखला के ऊंची पहाड़ी पर स्थापना करवा कर एक छोटा सा मंदिर भी बनवाया, गांव का नाम चौथ का बरवाड़ा हो गया। श्री भीमसिंह जी द्वारा अपने ही पिता की स्मृति में गांव के बाहर एक विशाल छतरी जिसमें शिवलिंग स्थापित करवाया था, तब पास ही एक तालाब भी बनवाया। छतरी आज भी बिजल की छतरी के नाम से तथा सिद्ध तालाब के रूप में प्रसिद्ध है। सवाई माधोपुर से मात्र 22 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम की तरफ अरावली श्रंखला के मध्य स्थित चौथ का बरवाड़ा सवाई माधोपुर जयपुर लोहारू रेलवे लाइन पर है। रेलवे स्टेशन चौथ माता का बरवाड़ा पड़ता है। चौथ का बरवाड़ा में प्रतिवर्ष चतुर्थी से अष्टमी तक श्री चौथ माता जी का विशाल मेला लगता है, जिसमें माता जी के दर्शन करने दूर-दूर के लाखों यात्री आते हैं और बिन मांगे सब कुछ पा जाते हैं। चौथ का बरवाड़ा में चौथ माता जी के साथ गणेश जी की प्रतिमा भी प्रतिष्ठित की गई है। चौथ गणेश की प्रतिमा साथ-साथ होने से इस स्थान का विशेष चमत्कार है। माताजी के मंदिर में श्री भैरव जी महाराज भी विराजमान है। माताजी के सैकड़ों वर्षो से घी की अखंड ज्योति जलती चली आ रही है।

                       महाराज भीम सिंह जी के देवी की उपासना नहीं करने वाले कमजोर उत्तर अधिकारियों पर राठौड़ों ने उस समय आक्रमण किया जबकि माताजी के नीचे वाली बस्ती में अक्षय तृतीया सोमवार को एक बारात प्रवेश कर रही थी, संपूर्ण बरात मारी गई थी। इसी वजह से आखा तीज को बरवाड़ा ठिकाना वर्ष के अधीन आने वाले गांव में माता जी की आठ पड़ गई। आखा तीज को आज भी ठिकाना बरवाड़ा व आसपास के गांव में शादी विवाह नहीं होते हैं। यहां तक कि घरों में कढ़ाई भी नहीं चढ़ती है। उस अक्षय तृतीया को सोमवार था। तो आज भी सोमवार को बहू बेटी को बाहर आने नहीं देते हैं। आज से लगभग कई वर्षों पूर्व माता जी के परम भक्त सारसी ठिकाने के जागीरदार महाराज श्री फतेह सिंह जी ने जयपुर में बूंदी के नरेश के मध्य होने वाले जयपुर नरेश की तरफ से युद्ध लड़ कर अदम्य वीरता दिखाई थी। कहावत है कि माताजी के प्रताप से उनका मुंड रहित धड़ ही युद्ध में लड़ता रहा। फतेह सिंह जी के योग्य एवं सफल माता जी के परम भक्त अधिकारियों के काल में ग्वालियर के महाराज रियासत के मध्य युद्ध होना तय हो गया था, तो ग्वालियर के महाराज होलकर मल्हार राव ने अपनी फौजी सवाई माधोपुर में इकट्ठे कर ली और युद्ध करने के लिए फौज आगे बढ़ी, तो बरवाड़ा दरबार ने उसे रोक दिया। मल्हार के पास भेजा कि बरवाड़ा दरबार युद्ध करना चाहता है, तो मल्हारराव कहते हैं-
पान की सीडी चबाकर थूकता लगा बर
गढ़ बरवाड़ा भेद द्यू म्हारो नाम मल्लार।।

और युद्ध करने के लिए आ जाते हैं। 2 दिन तक भयंकर गोलाबारी हुई, जिसके निशान गढ़ की दीवारों पर आज भी मौजूद है।बरवाड़ा दरबार ने उस समय चौथ माता जी की आराधना की, तो माता जी का ऐसा चमत्कार हुआ, की मल्हार राव को गढ़ की दीवारें धधकती तांबे की लगी, कंगूरे कंगूरे पर माताजी का हुक्का रूप झलक में लगा। जिसे देखकर मल्हारराव घबरा गए तथा अपनी हार मानकर जयपुर दरबार से बिना युद्ध किए ही वापस लौट आते।

चौथ का बरवाड़ा के अंतिम नरेश महाराजा श्री मान सिंह जी द्वितीय महायुद्ध में युद्ध करने गए थे। वहां पर चारों तरफ दुश्मनों से गिर गए तो चौथ माता जी रूप से प्रकट हुई और बोली बेटे मानसिंह घबराओ मत, बहादुरी से लड़े युद्ध में माताजी साक्षात् उनके साथ रही महाराज मान सिंह जी युद्ध जीतकर बरवाड़ा पधारे और खुशी में तालाब के पूर्व में एक भव्य शिव मंदिर बनवाया, जिसमें विशाल शिवलिंग की स्थापना है। ऐसा शिवलिंग आसपास देखने को नहीं मिलता। यह भविष्य मंदिर भी बरवाड़ा में एक दर्शनीय स्थल है। माना जाता है कि कुछ वर्षों पूर्व माता जी के मंदिर के ऊपर भयंकर बिजली गिरी थी। उस समय मंदिर में व्यक्ति और कन्हैया लाल जी ब्रह्मचारी मौजूद थे। उस वक्त दो तीन व्यक्ति बेहोश हो गए। सभी का जीवन संकट में पड़ गया था। उस समय ब्रह्मचारी जी ने चौथ माता जी की परिक्रमा देकर सबको भभूति और चौथ माता जी का ध्यान करते हुए बिजली का असर खत्म हो गया तथा बेहोश व्यक्ति भी ठीक हो गए मंदिर का कुछ नहीं बिगड़ा। बिजली गिरने के निशान मंदिर पर आज भी मौजूद है।

पखाला वाले रावजी चौथ माता जी को जब भी याद करते थे। उसी समय माता जी साक्षात रूप से उनके समक्ष आ जाती थी। वह जब खाला से चौथ माता जी के कनक दंडवत से आते थे। तो भरी हुई बनास नदी से भी माताजी के प्रभाव से उनका कुछ नहीं बिगड़ता था। चौथ माता जी की प्रेरणा से स्वामी मान सिंह जी रेलवे की बढ़िया नौकरी छोड़कर कोटा से कनक दंडवत करते हुए आई। माता जी कृपा से शीघ्र ही पैसा इकट्ठा हो गया। उसे माताजी की पहाड़ी पर जल में पहुंचवादिया। माताजी ऐसी भोली माताजी हैं, इनसे श्रद्धा भक्ति से जो भी कुछ मांगता है उसे वही मिलता है।

आरती गणेश जी की

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।। टेक।।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।
लड्डू बन के भोग लगे संत करें सेवा।। जय.।।
एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी।। जय।।
अंधन को आंख देत कोढिन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया।। जय।।
हार चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
सूरदास शरण आए सफल कीजे सेवा।।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।।

आरती श्री दुर्गा जी की

जय अंबे गौरी मैया जय मंगल मूरित मैया जय आनंद करणी
तुमको निशदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी।। टेक।।
मांग सिंदूर विराजत टीको मृग मद को।
उज्जवल से दो नैना चंद्र बदन निकों। जय।
कनक समान कलेवर भक्तांबर राजे। जय।
रक्त पुष्प गल माला कंठा पर छाजे। जय।
के हरी वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी।
सूर नर मुनि जन सेवक तिनके दुःख हारी। जय।
कानन कुंडल शोभित नासा गजमोती
कोटिक चंद्र दिवाकर राजद सम ज्योति। जय।
शुंभ निशुंभ बिडारे महिषासुर घाती
धूम्र विलोचन नैना निशदिन मधुमति। जय।
चौंसठ योगिन गावत नृत्य करत भैरों
बाजत ताल मृदंगा अरुण बाजत डमरू। जय।
भुजा चार अति शोभित खड़्ग खप्पर धारी
मन वांछित फल पावत सारे नर नारी। जय।
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती।
श्री माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योति। जय।
श्री अंबे की आरती जी कोई नर गावे
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपत्ति पावे। जय।

ओम जय करवा मैया माता जय करवा मैया
जो व्रत करे तुम्हारा पार करो नईया। ओम जय करवा मैया।।
सब जग की हो माता तुम हो रुद्राणी।
यश तुम्हारा गावत जग के सब प्राणी। ओम जय करवा मैया।।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी जो नारी व्रत करती।
दीर्घायु पति हो गई दुख सारे हरती।
होय सुहागिन नारी सुख संपति पावे।
गणपति जी बड़े दयालु विघ्न सभी नाशे।।
करवा मैया की आरती व्रत कर जो गावे।
व्रत हो जाता पूर्ण, सब विधि सुख पावे।।

 

https://youtu.be/uVCicigvQps
https://youtu.be/pkuwoorttro

करवा चौथ कब बनाई जाएगी?

करवा चौथ 24 अक्टूबर 2021  (रविवार) को मनाई जाएगी।

करवा चौथ का महत्व क्या है?

करवा चौथ सुहागन महिला के लिए महत्वपूर्ण है।

चंद्र दर्शन का समय क्या होगा करवा चौथ पर 2021में?

चंद्र दर्शन का समय रात 8:7 मिनट 24 अक्टूबर 2021 होगा।